भारत में पर्यावरण शासन में प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन और सतत विकास को लागू करने वाली नीतियां, कानून और संस्थाएं (जैसे कि पर्यावरण, पर्यावरण और पारिस्थितिकी आयोग (MoEFCC ) और CPCB)शामिल हैं , जो अनुच्छेद 21, 48A और 51A(g) की सर्वोच्च न्यायालय की व्याख्याओं से काफी हद तक निर्देशित होती हैं। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 द्वारा स्थापित इस ढांचे का उद्देश्य पारिस्थितिक स्वास्थ्य और विकास के बीच संतुलन स्थापित करना है, हालांकि इसे लागू करने में चुनौतियां भी हैं।
Environmental governance (पर्यावरणीय अभिशासन) का विचार अचानक नहीं आया, बल्कि यह औद्योगिक क्रांति के दुष्प्रभावों, वैश्विक वैज्ञानिक चेतावनियों और अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों (International Summits) के परिणामस्वरूप धीरे-धीरे विकसित हुआ है |
औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution): 19वीं और 20वीं शताब्दी में अंधाधुंध औद्योगिकीकरण के कारण प्रदूषण, वनों की कटाई और प्राकृतिक संसाधनों का दोहन तेजी से बढ़ा।
शुरुआती वैज्ञानिक चेतावनियां (1960s):
1962 में रेचेल कार्सन (Rachel Carson) की पुस्तक 'सॉफ्ट स्प्रिंग' (Silent Spring) ने कीटनाशकों (DDT) के पर्यावरण पर घातक प्रभावों को उजागर कर दुनिया को चौंका दिया।
1968 में 'क्लब ऑफ रोम' (Club of Rome) नामक थिंक-टैंक ने 'लिमिट्स टू ग्रोथ' (Limits to Growth) रिपोर्ट तैयार की, जिसने चेतावनी दी कि पृथ्वी के संसाधन सीमित हैं।
वैश्विक मोड़: स्टॉकहोम सम्मेलन, 1972 (The Catalyst)
पर्यावरणीय शासन को एक औपचारिक और संस्थागत ढांचा 1972 के संयुक्त राष्ट्र मानव पर्यावरण सम्मेलन (UNCHE), स्टॉकहोम से मिला।
पहला वैश्विक प्रयास: यह इतिहास का पहला ऐसा बड़ा सम्मेलन था जहाँ पर्यावरण को अंतर्राष्ट्रीय एजेंडे पर मुख्य स्थान दिया गया।
UNEP की स्थापना: इसी सम्मेलन के परिणामस्वरूप संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) का गठन हुआ, जो वैश्विक पर्यावरणीय नियमों को तय करने वाली पहली नोडल संस्था बनी।
भारत पर प्रभाव: तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी इस सम्मेलन में शामिल होने वाली एकमात्र विदेशी राष्ट्राध्यक्ष थीं। वहां से लौटकर उन्होंने भारत में पर्यावरण संरक्षण के लिए कदम उठाए, जिससे भारत में संस्थागत गवर्नेंस (जैसे 42वां संविधान संशोधन, CPCB की स्थापना) की शुरुआत हुई।
महा-परिवर्तन: रियो पृथ्वी सम्मेलन, 1992 (Earth Summit)
ब्राजील के रियो डी जेनेरियो में आयोजित संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण और विकास सम्मेलन (UNCED) ने पर्यावरणीय गवर्नेंस को पूरी तरह से संहिताबद्ध (Codified) कर दिया। यहाँ से तीन अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी ढांचे निकले:
UNFCCC: जलवायु परिवर्तन (Climate Change) से निपटने के लिए।
CBD (Convention on Biological Diversity): जैव विविधता के संरक्षण के लिए
Agenda 21: 21वीं सदी में सतत विकास को लागू करने का एक वैश्विक एक्शन प्लान
इसी सम्मेलन ने पर्यावरणीय कानूनों के मूल सिद्धांतों को स्थापित किया,
Polluter Pays Principle (प्रदूषक भुगतान करे सिद्धांत): जो प्रदूषण फैलाएगा, वही उसकी भरपाई का खर्च उठाएगा।
Precautionary Principle (एहतियाती सिद्धांत): वैज्ञानिक निश्चितता की कमी को पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने का बहाना नहीं बनाया जा सकता
5. आधुनिक चरण: सहस्राब्दी से सतत विकास लक्ष्य (MDGs से SDGs)
2000-2015 (MDGs): मिलेनियम डेवलपमेंट गोल्स के तहत पर्यावरणीय स्थिरता को एक लक्ष्य बनाया गया।
2015-2030 (SDGs & Paris Agreement): संयुक्त राष्ट्र द्वारा 17 सतत विकास लक्ष्य (SDGs) अपनाए गए और पेरिस समझौता (Paris Agreement) हुआ। अब पर्यावरणीय गवर्नेंस केवल सरकारों तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसमें नागरिक समाज (Civil Society), निजी क्षेत्र (Corporates) और अंतर्राष्ट्रीय न्यायालयों की भूमिका भी अनिवार्य हो गई है |
निष्कर्ष
पर्यावरणीय गवर्नेंस का विकास "संसाधनों के अंधाधुंध उपभोग" (Exploitation) से "पर्यावरण संरक्षण" (Conservation) और अंततः "सतत सह-अस्तित्व" (Sustainable Co-existence) की ओर एक क्रमिक यात्रा है। यह वैश्विक स्तर पर संधियों (Treaties) के माध्यम से आया और राष्ट्रीय स्तर पर कानूनों व नीतियों (जैसे भारत का EPA, 1986) के रूप में लागू हुआ |
संवैधानिक प्रावधान:
पर्यावरण का संरक्षण और सुधार तथा वनों और वन्य जीवन की सुरक्षा। राज्य को पर्यावरण, वनों और वन्यजीवों की रक्षा और सुधार करने का निर्देश देता है। [42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 ]
नागरिकों पर प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा करने का कर्तव्य लगाता है। [42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 ]
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्वच्छ और स्वस्थ पर्यावरण के अधिकार को शामिल करने के रूप में व्याख्या की गई है।
यह अनुसूची केंद्र और राज्य सरकारों के बीच पर्यावरण से संबंधित मामलों के बंटवारे को परिभाषित करती है:
समवर्ती सूची (Concurrent List): केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं।
प्रविष्टि 17A (वन): 42वें संशोधन (1976) के बाद वनों को राज्य सूची से इसमें डाला गया।
प्रविष्टि 17B (वन्यजीवों का संरक्षण): यह भी 42वें संशोधन द्वारा जोड़ा गया।
प्रविष्टि 20: आर्थिक और सामाजिक योजना (इसमें पर्यावरण संरक्षण भी शामिल है)।
संघ सूची (Union List): इस पर केंद्र सरकार कानून बनाती है।
प्रविष्टि 52: उद्योग (विनियमन) - इसमें प्रदूषण फैलाने वाले उद्योग शामिल हैं।
प्रविष्टि 53: तेल और तेल के क्षेत्र, खनिज और तेल संसाधन का नियमन।
प्रविष्टि 56: अंतर-राज्यीय नदियाँ और नदी घाटियाँ।
राज्य सूची (State List): इस पर राज्य सरकार कानून बनाती है।
प्रविष्टि 6: सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्वच्छता (इसमें स्वच्छता और अपशिष्ट प्रबंधन शामिल है)।
प्रविष्टि 14: कृषि।
प्रविष्टि 18: भूमि, जल, वन प्रबंधन।
यह अनुसूचित क्षेत्रों (Scheduled Areas) में प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन और स्थानीय समुदायों के अधिकारों से संबंधित है:
यह 5वीं अनुसूची के तहत राज्यपाल को जनजातीय क्षेत्रों में भूमि और प्राकृतिक संसाधनों (जैसे वन) पर स्थानीय समुदायों के अधिकारों की रक्षा करने का अधिकार देती है।
यह खनिजों और अन्य संसाधनों के दोहन में ग्राम सभाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने का आधार बनती है।
यह अनुसूची (असम, मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम) में स्वायत्त जिला परिषदों (ADCs) को विशेष शक्तियां देती है:
भूमि और वन प्रबंधन: ADCs को अपने क्षेत्र में भूमि, वनों के प्रबंधन, और जल संसाधनों के उपयोग पर कानून बनाने का अधिकार है।
कृषि: झूम खेती या पारंपरिक खेती के नियमों को विनियमित करने का अधिकार।
सांस्कृतिक संरक्षण: यह आदिवासियों की जीवनशैली और उनके प्राकृतिक आवास (जंगल) के बीच संबंध को संरक्षित करती है। [1]
भारतीय संविधान की 11वीं और 12वीं अनुसूचियां स्थानीय स्तर पर पर्यावरण शासन (Local Environmental Governance) को विकेंद्रीकृत (decentralize) करने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इन्हें क्रमशः 73वें और 74वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 1992 के माध्यम से जोड़ा गया था।
सामाजिक वानिकी और कृषि वानिकी (विषय 6): बंजर भूमि पर पेड़ लगाना और स्थानीय वन आवरण को बढ़ाना।
लघु वन उपज (विषय 7): गैर-लकड़ी वन उत्पादों (NTFPs) का सतत संग्रह और प्रबंधन।
शहरी वानिकी और पर्यावरण संरक्षण (विषय 8): शहरी पार्कों का विकास, वृक्षारोपण और पारिस्थितिक पहलुओं का प्रचार करना।
यूपीएससी (UPSC) के लिए मुख्य बिंदु
42वां संशोधन (1976): पर्यावरण शासन को सुदृढ़ करने के लिए संवैधानिक आधार प्रदान किया (वन को समवर्ती सूची में शामिल करना)।
संस्थागत ढांचा: पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत 'प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड' (CPCB/SPCB) का गठन किया गया।
वन अधिकार अधिनियम, 2006: 5वीं और 6ठी अनुसूची के क्षेत्रों में निर्णय लेने की प्रक्रिया को विकेंद्रीकृत करता है, जिससे स्थानीय समुदायों की भागीदारी बढ़ती है।
जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम (1974): जल स्रोतों की गुणवत्ता बनाए रखना।
वन (संरक्षण) अधिनियम (1980): वनों की कटाई को रोकने के लिए।
वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम (1981): वायु की गुणवत्ता में सुधार।
पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम (1986): एक 'छाता कानून' जो केंद्र सरकार को प्रदूषण नियंत्रण के लिए व्यापक शक्तियां देता है। भोपाल गैस त्रासदी के बाद नियामकीय कमियों को दूर करने के लिए अधिनियमित व्यापक कानून।
सार्वजनिक देयता बीमा अधिनियम (1991): खतरनाक पदार्थों से होने वाली दुर्घटनाओं के लिए क्षतिपूर्ति।
जैविक विविधता अधिनियम (2002): जैविक संसाधनों के संरक्षण के लिए।
पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC ): योजना और नीति निर्माण के लिए प्राथमिक एजेंसी।
सीपीसीबी/एसपीसीबी: केंद्रीय और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड पर्यावरण मानकों के अनुपालन की निगरानी करते हैं।
राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी): पर्यावरण संबंधी मुकदमों में तेजी लाने और प्रदूषण फैलाने वाले से भुगतान लेने के सिद्धांतों को लागू करने के लिए 2010 में स्थापित किया गया।
राष्ट्रीय पर्यावरण नीति (एनईपी) 2006: महत्वपूर्ण संसाधनों के संरक्षण और जनभागीदारी पर जोर देती है।
पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) अधिसूचनाएं: पारिस्थितिक प्रभावों का मूल्यांकन करने वाली परियोजनाओं के लिए मंजूरी अनिवार्य करती हैं।
जलवायु कार्य योजनाएं: जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना (एनएपीसीसी) और पेरिस समझौते के तहत राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित अंशदान (एनडीसी)।
सर्वोच्च न्यायालय ने जनहित याचिकाओं (पीआईएल)के माध्यम से महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है ।
इसने भारतीय कानून मेंएहतियाती सिद्धांत, प्रदूषण फैलाने वाले से भुगतान लेने का सिद्धांतऔर सतत विकासजैसे सिद्धांतों को शामिल किया ।
कार्यान्वयन में कमियां: राज्य एजेंसियों द्वारा कमजोर प्रवर्तन और MoEFCC का अत्यधिक नौकरशाहीकरण।
संघर्ष: तीव्र औद्योगिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना।
सहभागिता: जवाबदेही और स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए जमीनी स्तर पर बेहतर सहभागितापूर्ण योजना की आवश्यकता है।